सोमवार, अप्रैल 14, 2025


जिन्दगी जीने को एक फसाना होना चाहिए
रिश्तों में  नादान रूठना और मनाना चाहिए 
परिन्दे भी घोसला छोड़ देते हैं दाना चुगने के लिए
अपने लिए रोटी  तो जवाॅ बच्चों को कमाना  चाहिए 

                                                                                                                     @nadan 

बुधवार, अगस्त 31, 2022

Marne ke baad sataya gaya

 मरने के बाद भी हमको खूब सताया गया,

मारा रिश्तों ने इल्जाम बीमारी पर लगाया गया।


@Nadan 

31 Aug 2022

Kusoor Gareeb ka nikla

 गजब नसीब उस बदनसीब का निकला,

कातिल उसका, उसके करीब का निकला,

अदालत ने अमीरों को बाईज्जत बरी किया,

जाॅच में कुसूर सारा गरीब का निकला।

                                                                                                  @ Nadan
                                                                                                   31st Aug 2022

Rishte Bigadkar..................

 ढॅूढ रहा है छायीं पेड़ों को उखाड़कर,

इन्सान मकान बना रहा रिश्ते बिगाड़कर,


तालीम  भी तुमसे बदनाम हो रही है,

पा ली है मियॉ तुमने  डिग्री जुगाड़कर,


कोई देख भी ले तो  शर्मिन्दा न हो,

इन्सान होकर बस इतनी तो आड़कर,


बढ़ा रही है जो नफरतें इन्सान में,

खत्म कर दो उन किताबों को फाड़कर,


जिसके लिए है नादान उसके नाम कीजिए

रखकर परदे में  ना हुस्न को कबाड़कर।

                                                              @Nadan

                                  31st Aug 2022 Wednesday


सोमवार, अगस्त 22, 2022

दवा से ज्यादा प्यार की जरूरत है.........................

बजुर्गों की सेहत को सुधार की जरूरत है,

इनको दवा से ज्यादा प्यार की जरूरत है,

हड़बड़ी न करो मियॉ नाकाम हो जाओगे,

कामयाबी के लिए इन्तजार की जरूरत है  ।  

@ Nadan

लघुकथा ----- Personal Vs Professional

 


01

रामू मिस्त्री समय से डाॅक्टर साहब के घर पहुॅच गया था, वो एक मरीज देख रहे थे । रामू को देखते ही बोले अरे बैठो मिस्त्री अभी चलता हूॅ। रामू बैठ गया। मरीज को डाॅक्टर साहब ने कुछ सलाह दी और कहा कि यह दवा बाजार से ले लेना । मरीज नमस्ते करके चलने लगा, डाॅक्टर अरे यार फीस तो दे जाओ, मरीज बोला डाॅक्टर साहब हम आप बचपन मे एक साथ खेले हैं दोस्त रहे हैं । डाॅक्टर ने कहा अरे भाई यह मेरा पेशा है इसमें दोस्ती को मत लाओ । मरीज बोला अरे तुमने सिर्फ सलाह ही तो दी है दवा तो बाहर से ही लेनी है मुझे। डाॅक्टर ने उत्तर दिया सलाह तो मैं तुम्हें तभी दे पाया ना जब मैं इस काबिल बना, लाओ मेरी फीस 500 रूपए समय बर्बाद मत करो। मरीज मायूस हो गया और फीस देकर चला गया।

02

डाॅक्टर साहब ने रामू मिस्त्री को लगभग एक घंटा  पूरा घर उपर से नीचे तक घुमाया कहाॅ क्या बनेगा उसमे क्या क्या सामान लगेगा कितने दिन लगेंगे कितने लोग काम करेंगे। रामू ने सब कुछ बताया। डाॅक्टर साहब बोले ठीक हैं फिर मिलते हैं, जब शुरू करेंगे तब मैं तुम्हें बुला लुॅगा, कहकर डाॅक्टर दरवाजा बन्द करने लगे। रामू ने कहा सर रूकिए यह लीजिए एक कागज डाॅक्टर साहब की तरफ बढ़ाते हुए रामू ने कहा। डाॅक्टर ने कागज हाथ में लिया और देखते ही उनका चेहरा लाल हो गया यह क्या बदतमीजी है, तुम छोटे लोगों को जरा सा भी लिहाज नही है सम्बन्धों का, तुम्हें कितना काम दिलाया है मैनें यह सब भूल गए। रामू ने कहा डाॅक्टर साहब आपने काम दिलाया तो हमने भी तो अच्छा काम किया तभी तो आपने काम दिलाया। डाॅक्टर बोले यह क्या मतलब हुआ कि जरा सा तुम्हें सलाह के लिए बुला लिया और तुमने मुझे यह 200 का बिल पकड़ा दिया, आपसदारी में यह ठीक है क्या । रामू हॅसकर बोला डाॅक्टर  साहब यह तो हमने आज ही आपसे सीखा है जब आप अपने पेशे की सलाह देने के लिए अपने बचपन के दोस्त से फीस ले सकते हैं तो मैं अपने पेशे की सलाह के लिए फीस क्यों नही ले सकता, आप तो रसीद भी नही देते जिससे सरकार को टैक्स का नुकसान होता है, हम तो रसीद भी दे रहे हैं आपको। डाॅक्टर साहब हम पहले पर्सनल थे पर आपको देखकर प्रोफेशनल हो गए हैं, फीस दीजिए तो मैं भी चलूॅ आपको भी दूसरी क्लीनिक पर जाना होगा। डाॅक्टर निरूत्तर थे।

चुरा के दिल तमाम का................


 

खाने से ज्यादा आदमी दवाई खा रहा है....................

रिश्वत या हराम की कमाई खा रहा है,
खाने से ज्यादा आदमी दवाई खा रहा है,

मयस्सर नही बच्चों को दूध एक वक्त
साहब के घर कुत्ता मलाई खा रहा है,

होकर बड़ा आदमी कालोनी में जा बसा,
खामोशी पी रहा है अब तन्हाई खा रहा है,

शौहर कमाकर खिलाए तो कोई बात नही,
बेगम कमाए तो कहे औरत की कमाई खा रहा है

बाप दादा का नाम मिटटी में मिलाकर
अपनी को बेच जमीन पराई खा रहा है,

जैसी करनी वैसी भरनी देख ले नादान,
घर दमादू के घर बैठकर घर जमाई खा रहा है।
@Nadan


शुक्रवार, जनवरी 21, 2022



 अपनी खामियॉ किनारे करके देखिए,

जमाना खूबियॉ गिनाएगा मरके देखिए।

हम नशे में थे......



 तुम ज्यादा थे या कम नशे में थे,

हम कैसे बताएं खुद हम नशे में थे,


जश्न जन्मदिन का पीकर मनाने वाले,

मौत का मना रहे मातम नशे में थे,


तेरी सितमगरी का कभी बुरा नही माना,

हम पर किए गए तेरे सितम नशे में थे


मुफ्त पीने वाले इफरात पीकर गिर पडे़,

जेब से पीने वाले मिले कम नशे में थे,


ज्यादा पीने वालों को छोड़ दिया पुलिस ने,

जेल भेजे गए वो जो कम नशे में थे,


खुशी के मौके पर पी लेता हूॅ थोड़ी सी

ये कहने वाले नादान मिले हरदम नशे में थे ।

@ Nadan

गुरुवार, सितंबर 23, 2021



आज दिनाक २३ सितम्बर २०२१ को एक आशु कविता प्रतियोगिता में मुझे आईना शीर्षक पर कविता लिखने को मिला था मैंने चार मुक्तक लिखे जो आपके लिए हाज़िर हैं 

 आईना

आँखे भर आयीं ,

 उसका एहसास देखकर 

 आइना चिटक गया ,

मुझे उदास देखकर 

 

तू कुछ भी हो जा, तेरे अर्दब में न आऊंगा ,

आइना हूँ मैं,  तुम जैसे हो, वैसा ही दिखाऊंगा 

 

मैं कितना भी छिपाऊं,

 मेरी परेशानियां समझ जाती है

मेरी माँ, मुझे मेरी जिंदगी 

का आईना नज़र आती है 

 

क्यों  खड़े हो आईने के सामने 

श्रृंगार करके ,

हमारी तरह तारीफ नहीं करेगा तुम्हें 

बाँहो में भरके

रविवार, जून 21, 2020

हमारा भी बदन दुखता है.................................................

सो गए शांतिलाल, अचानक आयी इस आवाज ने शांतिलाल को नींद के बाॅर्डर से वापस बुला लिया, शांतिलाल ’बोले कौन है’ ?
आवाज फिर आयी- हम हैं शांतिलाल ।
शांतिलाल- अरे हम कौन कोई नाम है तुम्हारा कि नही।
उत्तर मिला- गजब आदमी हो शांतिलाल तुम हमारी आवाज भी नही पहचानते, सारा दिन पैरों से रौंदते हो और आवाज भी नही पहचानते।
शांतिलाल बेचैन होकर उठ गए दरवाजा खोला बाहर झाॅका इधर उधर देखा कोई नही था। दरवाजा बन्द करके खटिया पर आकर बैठ गए।
आवाज फिर आयी- शांतिलाल बोलते क्यों नही ?
शांतिलाल - अरे यार कौन हो सामने क्यों नही आते, क्या भूत प्रेतों के खानदान से हो।
’इधर देखो शांतिलाल’ आवाज फिर आयी।
शांतिलाल टिमटिमाते जीरो वाट के नाईट बल्ब की हल्की रोशनी में भारी मन की तेज आॅखों से  आवाज को तलाश करने लगे।
आवाज को एहसास हो गया कि शांतिलाल सर्च मोड में हैं, शांतिलाल को ज्यादा मेहनत न करना पडे़ इसलिए उनकी मदद के लिए आवाज ने फिर पुकारा इधर देखो शांतिलाल इधर। आवाज की दिशा में देखते ही शांतिलाल चैंक गए और खड़े हो गए और 4जी की स्पीड से बोलने लगे अबे तू भी बोलने लगा होश मे तो है, औकात से बाहर आने पर तुझे डर नही लगा अबे अपने दायरे में रहे अपना काम कर फालतू लफड़े में क्यों पड़ रहा है।
हाॅ शांतिलाल मैं तुमसे इसी विषय पर बात करना चाहता हॅू तुम भी अपने दायरे में रहो अपना काम करो फालतू लफड़े में क्यों पड़ते हो।
शांतिलाल- अबे मैंने क्या बिगाड़ा तेरा जो तुझे मुझे उपदेश दे रहा है।
उत्तर मिला शांतिलाल हमारा जो काम है हमसे वही लिया करो, एक के साथ एक मुफ्त वाली योजना हम पर लागू नही होती है और सुनो हम सदियों से रक्षा करने के लिए जाने जाते हैं न कि हमला करने के लिए हम अहिंसा के पुजारी हैं, तुम अपनी हिंसा में हमें भागीदार मत बनाओ वरना बुरा हो जाएगा। तुम इंसानों ने हमारा जितना उत्पीड़न किया है उतना किसी का नही किया, फिर भी हम तुम्हारी सेवा में लगे हैं।
अबे तेरे ऊपर पैसा खर्च किया है’ शांतिलाल का गुस्सा चरम पर था।
हाॅ पैसा खर्चा किया है जिस काम के लिए वही काम लिया करो वरना तुम्हारे पैरों में काटना शुरू कर दूॅगा तो समझ में आ जाएगी मेरी ताकत क्या है।
शांतिलाल- अरे मुझे उलझाओ नही यह बताओ की तुम चाहते क्या हो ?
अब आए  मुद्दे की बात पर, ध्यान से सुनों शांतिलाल तुम आजकल गुस्से में बहुत रहते हो। बिना सोचे समझे बेटों को मारने लगते हो, तुम्हारे आपसी झगड़े में हमें शर्मिन्दा होना पड़ता है, तुम्हारे इस लफडे़ की वजह से मेरे पूरे बदन में दर्द हो रहा है, इसलिए माफी चाहता हूॅ , अपने गृहयुद्व में हमको शांमिल मत करो। अपनी लड़ाई अपने आप लड़ो ठीक है।
शांतिलाल- अरे यार मैं अपने बेटों का मारूं दुत्कारूं तुमसे क्या मतलब। तुम जूते हो जूते की तरह रहो।
जूता बोला- शांतिलाल तुम हमें पैरों के लिए लाए थे, हाथों के लिए नही, मारने के लिए लाठी डंडा आती है वो खरीदो पर तुम ठहरे महा कंजूस, हमें खरीदा था पहनने के लिए और हमे हथियारों की तरह इस्तेमाल कर रहे हो, तुम बेटों को मारने के लिए हमारा इस्तेमाल करते हो, गुस्से में भी कहते हो जूता मारूॅगा, कुत्ता बिल्ली दिख जाए तो भी चिल्लाते हो मार जूता फेक के। हद है जब देखो हमारा दुरूपयोग करते हो।
शांतिलाल- अरे तुम्हें क्या इससे चोट तो मेरे बेटों को लगती है, विरोध तो उनको करना चाहिए।
तभी दूसरे पैर का जूता बोल पड़ा- अरे यार यह महाकंजूस है, तुम्हें याद है जब यह अपने एक सहयोगी की शादी में गया था, हमें पहनकर हम कितने खुश थे कि अपने तमाम महॅगे सस्ते ब्रांड वाले साथियों से मिलेंगे, लेकिन इन भाई साहब ने खाना खाया और हमें तकिया की तरह इस्तेमाल किया जबकि ज्यादातर लोगो  ने वहाॅ हवा वाला तकिया खरीद लिया था। 
शांतिलाल- चुपकर तू, शादी ब्याह में जूते चोरी हो जाते हैं इसलिए मैने सिरहाने रख लिए था तुझे, तेरी तो शान बढ़ायी मैनें सर के नीचे रखकर तेरी जगह तो पैरों मे है। 
जूता- हाॅ मैं यही बताना चाहता हॅू कि मेरी जगह पैरों में हैं वहीं रहने दो, हमें मारपीट में इस्तेमाल मत किया करो , बदन दुखता है हमारा, कभी सोचा है इस बारे में, तुमने तो हाथ में उठायी और दे दनादन दे दनादन, जिसको मारते हो उसका तो इलाज करा देते हो, पर हमें कभी पूछा है, और दे दनादन दे दनादन के बाद तुरन्त पैरों में पहने लेते हो सौ किलो का वजन रख चल पड़ते हो यह भी नही सोचते की इस्तेमाल के बाद हमें भी थोड़ी देर आराम दे दो।
शांतिलाल- अबे तुम तो ऐसी बात कर रहे हो जैसे तुम्हारा बहुत बड़ा अपमान कर दिया मैनें।
जूता- अरे हमारा क्या अपमान होगा, जूते हैं जूते रहेगें, हम तो समझा रहे हैं कि हमारे चक्कर में अपनी इज्जत कम मत करो वरना रह जाओगे तरसते हुए।
शांतिलाल- मैं समझा नही। काहे को तरसते हुए ।
जूता- अरे भाई बेटों को मारते हो, अगर बेटे गुस्सा हो गए तो समझ लेना सोशल मीडिया पर फोटो नही डालेंगे तुम्हारी, तुम्हारा फादर डे बिना नेटवर्क के मोबाईल जैसा गुजरेगा। समझे।
शांतिलाल कुछ कह पाते इससे पहले उनकी पत्नी ने हिलाकर उठाया चलिए उठिए चाय पी लीजिए सवेरा हो गया। 
शांतिलाल नींद से जाग गए और सपना टूट गया ध्यान से देखा जूते खामोश अपने स्थान पर रखे थे ।

सोमवार, जून 01, 2020

लघुकथा

लघुकथा
01
रामू मिस्त्री समय से डाॅक्टर साहब के घर पहुॅच गया था, वो एक मरीज देख रहे थे । रामू को देखते ही बोले अरे बैठो मिस्त्री अभी चलता हूॅ। रामू बैठ गया। मरीज को डाॅक्टर साहब ने कुछ सलाह दी और कहा कि यह दवा बाजार से ले लेना । मरीज नमस्ते करके चलने लगा, डाॅक्टर अरे यार फीस तो दे जाओ, मरीज बोला डाॅक्टर साहब हम आप बचपन मे एक साथ खेले हैं दोस्त रहे हैं । डाॅक्टर ने कहा अरे भाई यह मेरा पेशा है इसमें दोस्ती को मत लाओ । मरीज बोला अरे तुमने सिर्फ सलाह ही तो दी है दवा तो बाहर से ही लेनी है मुझे। डाॅक्टर ने उत्तर दिया सलाह तो मैं तुम्हें तभी दे पाया ना जब मैं इस काबिल बना, लाओ मेरी फीस 500 रूपए समय बर्बाद मत करो। मरीज मायूस हो गया और फीस देकर चला गया।
02
डाॅक्टर साहब ने रामू मिस्त्री को लगभग एक घंटा  पूरा घर उपर से नीचे तक घुमाया कहाॅ क्या बनेगा उसमे क्या क्या सामान लगेगा कितने दिन लगेंगे कितने लोग काम करेंगे। रामू ने सब कुछ बताया। डाॅक्टर साहब बोले ठीक हैं फिर मिलते हैं, जब शुरू करेंगे तब मैं तुम्हें बुला लुॅगा, कहकर डाॅक्टर दरवाजा बन्द करने लगे। रामू ने कहा सर रूकिए यह लीजिए एक कागज डाॅक्टर साहब की तरफ बढ़ाते हुए रामू ने कहा। डाॅक्टर ने कागज हाथ में लिया और देखते ही उनका चेहरा लाल हो गया यह क्या बदतमीजी है, तुम छोटे लोगों को जरा सा भी लिहाज नही है सम्बन्धों का, तुम्हें कितना काम दिलाया है मैनें यह सब भूल गए। रामू ने कहा डाॅक्टर साहब आपने काम दिलाया तो हमने भी तो अच्छा काम किया तभी तो आपने काम दिलाया। डाॅक्टर बोले यह क्या मतलब हुआ कि जरा सा तुम्हें सलाह के लिए बुला लिया और तुमने मुझे यह 200 का बिल पकड़ा दिया, आपसदारी में यह ठीक है क्या । रामू हॅसकर बोला डाॅक्टर  साहब यह तो हमने आज ही आपसे सीखा है जब आप अपने पेशे की सलाह देने के लिए अपने बचपन के दोस्त से फीस ले सकते हैं तो मैं अपने पेशे की सलाह के लिए फीस क्यों नही ले सकता, आप तो रसीद भी नही देते जिससे सरकार को टैक्स का नुकसान होता है, हम तो रसीद भी दे रहे हैं आपको। डाॅक्टर साहब हम पहले पर्सनल थे पर आपको देखकर प्रोफेशनल हो गए हैं, फीस दीजिए तो मैं भी चलूॅ आपको भी दूसरी क्लीनिक पर जाना होगा। डाॅक्टर निरूत्तर थे।

शुक्रवार, मई 15, 2020

कोरोना काल में प्रासंगिक यह मुहावरा.....................जंगल मे मोर नाचा किसने देखा...........

       मेरे एक बहुत ही करीबी हैं उनसे क्या रिश्ता है मैं आज तक निर्धारित नही कर पाया हूॅ क्योंकि जिस भी रिश्ते के दायरे में उनको लाना चाहता हूॅ उनके व्यक्तित्व के आगे हर रिश्ता छोटा नजर आता है , फिर भी मैं उन्हें भैया कहता हॅू । 

        उनका व्यक्तित्व उनके द्वारा ही निर्मित है, मंचों पर सम्मान प्राप्ति में उनका नाम उनके खानदान में सबसे टाॅप पर है, कमरे में जगह नही है, पुरस्कार और सम्मान में जो शील्ड मिली हैं वो रात में जगह प्राप्ति के लिए उधर खिसको दबे जा रहे हैं कहते हुए एक दूसरे से लड़ती हैं । 

         हाॅ हर सम्मान के बाद अपने उद्बोधन में वो एक वाक्य को पिछले कई वर्षों से बोलते आ रहे हैं और वो यह कि आज मैं जो कुछ भी हूॅ उसका श्रेय अम्मा को जाता है । मेरी जानकारी में अपनी अम्मा और अपने बाबूजी को दो ही लोग हर मौके पर याद करते हैं, बाबू जी को याद करने वाले हैं सदी के महानायक अमिताभ बच्चन और अम्मा को याद करने वाले यह हमारे भैया साहब ।

         हम दोनो अक्सर मौका मिलते ही चाय पर चर्चा कर लेते हैं स्थान निर्धारित नही है पर हम दोनो ही होंगे और चर्चा होगी यह निश्चित है, मैंने एक बार चाय की चुस्कियाॅ लेते हुए उनसे कहा भैया आपके साथ के लोग कहाॅ पहुॅच गए और आप...........। मेरी बात को उन्होनें बीच में ही रोक दिया बोले रूको, मुझे बहुत मौके मिले वहाॅ तक पहुॅचने के पर मैंने स्वीकार नही किया। मैने कहा क्यों ? बोले भाई जंगल में मोर नाचा किसने देखा । मैने कहा क्या मतलब ? सुनिएगा भैया का जवाब ध्यान से । वो बोले भाई आज मैं जिस मुकाम पर हूॅ, जितना सम्मान और स्नेह यहाॅ मिल रहा है, यह उन्हीं लोगो के सामने मिल रहा है, जिन्होने मुझे............फुटपाथ पर अखबार बेचते और अन्य छोटे छोटे काम करते देखा था, लगभग 45 साल पहले का ये फुटपाथी अखबार विक्रेता आज जब मंच पर सम्मान प्राप्त कर्ता या अतिथि के रूप में आता है तो सामने बैठे दर्शकों में वही लोग होते हैं जिन्होने मेरा संघर्ष देखा है, जब हाॅल में तालियाॅ बजती है और मैं अपनी अम्मा का नाम लेता हॅू तो मेरी आॅखों में जो चमक होती है, वाणी में जो गर्व होता है, शरीर को जो ऊर्जा मिलती है, वो शायद वहाॅ परदेश में  ना मिलती जहाॅ मैं गया नही। भले ही मैं दौलत नही कमा पाया पर अपने शहर ने जो सम्मान दिया और अपने लोगो ने जो स्वीकार्यता दी है, उसे देखकर और सुनकर अम्मा आज भी स्वस्थ और प्रसन्न है शायद परदेश की कमायी दौलत अम्मा को और मुझे यह गर्व और खुशी नही दे पाती।

       चलिए अब आते हैं इस संस्मरण की प्रासंगिकता पर जिसने मुझे लिखने के लिए विवश किया..........इस कोरोना दौर में पैदल चल रहे मजदूरों और अपने घर आने के लिए परेशान दिख रहे परदेश कमाने गए लोगों की दुर्दशा देखकर, मुझे आदरणीय  भैया की जंगल में मोर नाचा किसने देखा वाली बात याद आ गयी और यह संस्मरण लिख दिया।

        उनका नाम नही लिखा पर यह फुटपाथ पर अखबार बेचना वाला आज वरिष्ठ पत्रकार है, न्यूज रीडर है, भारत के एक बहुत बडे़ पत्रकारिता संस्थान के पूर्व छात्रों के संगठन का पदाधिकारी है। हरदिल अजीज महोदय के वर्णन मात्र से तमाम लोग उन्हें पहचान गए होंगे।

       अगर भैया इसे पढ़े और कोई त्रुटि हो तो मुझे माफ कीजिएगा और सराहनीय लेख हो तो चाय पर चर्चा का आमंत्रण दीजिएगा। सादर सहित।

रविवार, मई 10, 2020


लिखने वाले ने लिखी,
हमारी किस्मत कितनी विचित्र है,
माॅ को छीन लिया हमसे,
रह गया पास  माॅ का चित्र है।